भारतीय शास्त्रीय नृत्य

इतिहास

भारतीय नृत्य का इतिहास काफी पुराना है। इसके आरंभिक साक्ष्य पुरा पाषाण काल के गुफा चित्रों में ढूँढे जा सकते हैं। भीमबेटका और होशंगाबाद की गुफाओं में सामुदायिक नृत्य के अनेक चित्र प्राप्त हुए हैं। हड़प्पा सभ्यता से भी पुरुष और महिला नृत्य शैलियों के स्पष्ट साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। हड़प्पा से एक पुरुष नर्तक की प्रस्तर प्रतिमा प्राप्त हुई है, जिसकी तुलना सर जॉन मार्शल ‘नटराज’ से करते हैं। इसके अतिरिक्त मोहनजोदड़ो से भी नर्तकी की कांस्य प्रतिमा प्राप्त हुई है। वैदिक परंपरा के ग्रन्थों में भी नृत्य के संदर्भ यत्र-तत्र विद्यमान हैं। देवलोक की अप्सराओं के अतिरिक्त देवराज इन्द्र के भी कुशल नर्तक होने का उल्लेख है। विभिन्न कथाओं में शिव और पार्वती के नृत्य का उल्लेख मिलता है। इसके अतिरिक्त भस्मासुर की कथा में मोहिनी रूप धारी विष्णु के नृत्य का उल्लेख है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, हरिवंश पुराण, शिव पुराण, महाकाव्यों आदि में नृत्य की चर्चा कई बार होती है। स्पष्ट है कि हड़प्पा वासियों की तरह वैदिक आर्य भी नृत्य कला से पूर्णतया परिचित थे।

                  भरत मुनि के नाट्यशास्त्र में नृत्य की विस्तृत चर्चा है। नाट्यशास्त्र के बारे में कहा जाता है कि इसके प्रवर्तक स्वयं प्रजापति हैं, जिन्होंने ऋग्वेद से पाठ्य, सामवेद से गीत, यजुर्वेद से अभिनय तथा अथर्ववेद से रस का परिग्रह कर इस पंचम वेद का प्रादुर्भाव किया। शिव-पार्वती ने लोकानुरंजन हेतु ताण्डव एवं लास्य का सहयोग देकर इसे उपकृत किया है। अर्थात, भरत मुनि के अनुसार नृत्य के सृजक शिव और पार्वती ही हैं। इस आधार पर सभी नृत्य दो श्रेणियों- तांडव और लास्य में वर्गीकृत किए जाते हैं। तांडव नृत्य जहाँ पौरुष प्रधान, ओज युक्त होता है, वहीं लास्य माधुर्य युक्त और सौंदर्य प्रधान होता है। लास्य में नृत्य के माध्यम से भावभिव्यक्ति पर ज़्यादा ज़ोर होता है।

नृत्य के अंग      

 नाट्यशास्त्र में नाटक के तीन अंगों का उल्लेख है-

  • नृत्त – अंगों का संचालन
  • नाट्य – अंग संचालन के साथ कथात्मक नाट्य प्रस्तुति
  • नृत्य- अंग संचालन तथा कथात्मक नाट्य प्रस्तुति के साथ भावभिव्यक्ति

नृत्य के माध्यम से नौ रसों की अभिवव्यक्ति की जाती है। शृंगार के द्वारा प्रेम(रति) की, रौद्र रस  के द्वारा क्रोध की, वीभत्स रस के द्वारा जुगुप्सा की, शांत रस के द्वारा निर्वेद की, वीर रस के द्वारा उत्साह की, हास्य रस के द्वारा हास की, करुण रस के द्वारा दुख की, भयानक रस के द्वारा भय की और अद्भुत रस के द्वारा आश्चर्य की अभिव्यक्ति की जाती है।

नृत्य की मुद्राएँ

नृत्य में अंग संचालन के विविध रूप भावाभिव्यक्ति के लिए प्रयुक्त होते हैं। इन्हें मुद्राएँ कहते हैं। इनकी कुल संख्या 108 मानी गयी है।

शास्त्रीय नृत्य

शास्त्रीय नृत्य विभिन्न शास्त्रों में वर्णित नियमों पर आधारित होते हैं। ये गुरु शिष्य परंपरा में विकसित होते हैं। संगीत नाटक अकादमी और भारत के संस्कृति मंत्रालय द्वारा इनकी सूची तैयार की जाती है। वर्तमान में संगीत नाटक अकादमी की सूची में 8 शास्त्रीय नृत्य हैं, जबकि संस्कृति मंत्रालय द्वारा 11 नृत्य शास्त्रीय नृत्य के रूप में स्वीकृत हैं।

नृत्यउद्गम स्थलसंगीत नाटक अकादमी द्वारा स्वीकृतसंस्कृति मंत्रालय द्वारा स्वीकृत
भरतनाट्यमतमिलनाडुहाँहाँ
छऊउड़ीसा, बंगाल, झारखंडनहींहाँ
गौड़ीय नृत्यबंगालनहींहाँ
कत्थकउत्तर भारतहाँहाँ
कथकलीकेरलहाँहाँ
कुचीपुड़ीआंध्र प्रदेशहाँहाँ
मणिपुरीमणिपुरहाँहाँ
मोहिनीअट्टमकेरलहाँहाँ
ओडिसीउड़ीसाहाँहाँ
सत्रीयाअसमहाँहाँ
थाँगटामणिपुरनहींहाँ

भौतिक तत्वों से सम्बद्ध नृत्य

नाट्यशास्त्र में 5 नृत्यों को 5 भौतिक तत्वों से संबद्ध माना गया है।

  • भरतनाट्यम- अग्नि
  • ओडिसी- जल
  • कुचीपुड़ी- पृथ्वी
  • मोहिनीअट्टम- वायु
  • कथकली- आकाश

भरतनाट्यम

यह नाट्यशास्त्र में वर्णित प्राचीनतम शास्त्रीय नृत्य है। इस नृत्य में नर्तक का अंग संचालन नाचती लौ की तरह प्रतीत होता है। यह तांडव और लास्य नाट्य रूपों का सम्मिलन है।

         इसकी उत्पत्ति दक्षिण भारत के तमिल प्रदेश में प्राचीन काल में प्रचलित देवदासियों के नृत्य से मानी जाती है। तब यह नृत्य सादिर, चिन्नामेलन और दासी अट्टम के नाम से लोकप्रिय था। 20 वीं शताब्दी में रुक्मिणी देवी अरुंडेल ने मंच प्रस्तुतियों के माध्यम से भरतनाट्यम के रूप में इसे लोकप्रिय बनाया

छऊ

बंगाल, उड़ीसा और झारखंड के क्षेत्रों में प्रचलित यह नृत्य नृत्य और युद्ध कला का संयोजन प्रस्तुत करता है। नर्तक पशु-पक्षियों का रूप धारण करते हैं। इसकी मुद्राएँ ग्रामीण गृहणियों के दैनिक कार्यकलापों पर आधारित हैं। यह नृत्य पुरुष नर्तकों द्वारा एक खुली जगह पर किया जाता है, जिसे अखाड़ा या असार कहते हैं। इसमें मोहुरी, शहनाई ,ढ़ोल और धुमसा जैसे वाद्य यंत्रों का प्रयोग किया जाता है। लोक कथाओं के अतिरिक्त महाकाव्यों के प्रसंग इसके वर्ण्य विषय होते हैं।

कथकली

यह केरल का नाट्य-नृत्य है। यह कालीकट के जमोरिन राजा मानवदन द्वारा रचित माना जाता है। यह नृत्य कृष्णलीलाओं पर आधारित कृष्णाअट्टम से निष्पन्न माना जाता है। इसमें वेशभूषा एवं साज सज्जा को काफी महत्व दिया जाता है। पोशाक काफी तड़क भड़क वाली होती है। नर्तक सर पर मुकुट का भी प्रयोग करते हैं।

सत्रीया

इसे असम में 16वीं सदी में वैष्णव संत शंकर देव द्वारा प्रारम्भ किया गया। सन 2000 ई में इसे शास्त्रीय नृत्य के रूप में स्वीकृति मिली। परंपरा से यह नृत्य पुरुष वैष्णव भक्तों (भोकोत) द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

कुचीपुड़ी

इसकी उत्पत्ति आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले के गाँव कुचीपुड़ी के ब्राह्मणों के परंपरागत नृत्य से मानी जाती है। इसी आधार पर इसका नामांकन हुआ है। यह प्राचीनतम शास्त्रीय नृत्यों में से एक है। 17वीं शताब्दी के आसपास सिद्धेन्द्र योगी ने इसके आधुनिक रूप को प्रचलित किया।

कत्थक

इसका नाम संस्कृत शब्द ‘कथा’ से निष्पन्न माना जाता है। यह पाँवों के संचालन और गति पर आधारित नृत्य है। भक्ति आंदोलन और फारसी परम्पराओं का स्पष्ट प्रभाव इस नृत्य पर देखा जा सकता है। इसके छोटे रूप को टुकड़ा कहते हैं, जबकि इसी नृत्य का बड़ा रूप तोड़ा कहलाता है। इसके चार पारंपरिक घराने हैं। कछवाहा राजपूतों द्वारा संरक्षित जयपुर घराना, अवध के नवाबों द्वारा संरक्षित लखनऊ घराना, बनारस के राजाओं द्वारा संरक्षित बनारस घराना तथा रायगढ़ के शासकों द्वारा संरक्षित रायगढ़ घराना। रायगढ़ घराना अन्य तीन घरानों की अपेक्षा परवर्ती है, लेकिन अपनी विशिष्ट भाव-भंगिमाओं के कारण इसने अपनी अलग पहचान निर्मित की है।

मोहिनीअट्टम

केरल का यह नृत्य एकल स्त्री प्रस्तुति के रूप प्रदर्शित किया जाता है। सुनहरे किनारे वाली सफ़ेद सारी (कसावु) इसकी विशिष्ट वेशभूषा है। त्रावणकोर के राजा स्वाथि तिरुनल द्वारा 19वीं सदी में इसे प्रचलित किया गया। 1930 के आसपास प्रसिद्ध राष्ट्रवादी कवि वल्लतोल ने इसे लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

ओडिसी

पुरातात्विक प्रमाणों के अनुसार यह प्राचीनतम शास्त्रीय नृत्य है। यह नृत्य भंगों पर आधारित है। भंगों का आशय शरीर के विभिन्न अंगों को मोड़ने और उनकी स्वतंत्र गति से है। इस नृत्य में कई प्रकार के भंग होते हैं, जिनमें चार – भंग, अभंग, अतिभंग और त्रिभंग सर्वाधिक लोकप्रिय हैं।

मणिपुरी

यह नृत्य राधा और कृष्ण की रासलीला पर आधारित है। माना जाता है कि इसका प्रचालन रामायण और महाभारत में वर्णित गन्धर्व जाति ने किया था। इस नृत्य में घुँघरू का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। नर्तक घुंघरुओं के स्थान पर पाँवों के थापों से आवाज करते हैं।