भारतीय संगीत की उत्पत्ति और विकास

भारतीय संगीत की उत्पत्ति के शुरूआ्ती साक्ष्य वेदों में प्राप्त होते हैं. चारों वेदों -ऋक् ,साम ,यजुर् और अथर्व के अतिरिक्त ब्राह्मणों और उपनिषदों में संगीत के सन्दर्भ मिलते हैं . कई वाद्ययंत्रों के सन्दर्भ हमें इन ग्रंथों में मिलते हैं .वेणु (Flute) , तुनव ( Trumpet-युद्धघोष के लिए) ,नाली (Metal Flute)  ,शंख और भेरी फूंक कर बजाये जाने वाले वाद्य हैं . बकुर दो नलिकाओं वाली बांसुरी है , जबकि कराधुनी बांसुरी में शंख जुड़ा होता है .गोधा , वक्रा , अलावू और कपिशीर्ष आदि वैदिक साहित्य में वर्णित वीणा के प्रकार हैं  .अघाति , गर्गर और वान भी तार वाले वाद्य हैं . दुन्दुभी और तालव थाप देकर बजाए जाने वाले वाद्य(Drum Instruments) हैं , जिनका प्रयोग संगीत के प्रारंभ में होता है . बौद्ध और जैन ग्रंथों में भी विभिन्न वाद्ययंत्रों के नाम मिलते हैं ,यथा : मर्दुक,दर्दुर , डिंडिम,मृदंग,पानव,अणक,आडम्बर आदि .

                                                पाणिनि की अष्टाध्यायी में पातह और जर्जर जैसे झांझ यंत्रों की चर्चा मिलती है .
    ऐतरेय आरण्यक में वीणा के अंगों का वर्णन है . इसके अनुसार अश्वमेध यज्ञ के अवसर पर वीणा बजाई जाती थी .महाव्रत के समय वेणु और दुन्दुभी के वादन का जिक्र मिलता है . जैमिनीय ब्राह्मण में गीत -संगीत की चर्चा नृत्य के साथ संयुक्त रूप से है . कौशीतकी ब्राह्मण में गीत , संगीत और नृत्य को संयुक्त रूप से शिल्प कहा गया है .
                          संगीत के आरंभिक उल्लेखों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं यज्ञ के अवसर पर उद्गाता नामक पुरोहितों द्वारा किया जाने वाला ऋग्वेद के मन्त्रों का गायन . ये मन्त्र तीन अलग अलग प्रकार से गाये जाते थे . इन्हीं मन्त्रों का संकलन है सामवेद . सामन् का शाब्दिक अर्थ है संगीत . ऋग्वेद के मन्त्रों की संगीतबद्ध प्रस्तुति होने के कारण इस वेद को सामवेद कहा गया .