प्राचीन भारतीय स्थापत्य

हड़प्पा

भारत में स्थापत्य व वास्तुकला की उत्पत्ति हड़प्पा काल से मानी जाती है। स्थापत्य व वास्तुकला के दृष्टिकोण से हड़प्पा संस्कृति तत्कालीन संस्कृतियों से काफी ज्यादा आगे थी। हड़प्पा की नगर योजना इसका एक जीवंत साक्ष्य है। नगर योजना इस तरह की थी कि सड़कें एक-दूसरे को समकोण में काटती थीं। हड़प्पा व मोहनजोदड़ो इस सभ्यता के प्रमुख नगर थे। यहां की इमारतें पक्की ईंटों की बनाई जाती थीं। यह एक ऐसी विशेषता है जो तत्कालीन किसी अन्य सभ्यता में नहीं पाई जाती थी। मोहनजोदड़ो की सबसे बड़ी इमारत उसका स्नानागार था। घरों के निर्माण में पत्थर और लकड़ी का भी प्रयोग किया जाता था।

बौद्ध स्थापत्य

स्तूप

 स्तूप का शाब्दिक अर्थ है- ‘किसी वस्तु का ढेर’। स्तूप का विकास ही संभवतः मिट्टी के ऐसे चबूतरे से हुआ, जिसका निर्माण मृतक की चिता के ऊपर अथवा मृतक की चुनी हुई अस्थियों के रखने के लिए किया जाता था। गौतम बुद्ध के जीवन की प्रमुख घटनाओं, जन्म, सम्बोधि, धर्मचक्र प्रवर्तन तथा निर्वाण से सम्बन्धित स्थानों पर भी स्तूपों का निर्माण हुआ। स्तूप एक गुम्दाकार भवन होता था, जो बुद्ध से संबंधित सामग्री या स्मारक के रूप में स्थापित किया जाता था।

स्तूप के भेद

स्तूप के 4 भेद हैं-

  • शारीरिक स्तूप- बुद्ध और उनसे जुड़े व्यक्तियों के शारीरिक अवशेषों पर
  • पारिभोगिक स्तूप- बुद्ध तथा बौद्ध धर्म के महत्वपूर्ण व्यक्तियों के द्वारा प्रयोग की गयी वस्तुओं के ऊपर
  • उद्देशिका स्तूप- बुद्ध से जुड़ी विभिन्न घटनाओं को प्रतीकित करने के लिए
  • पूजार्थक स्तूप- बौद्ध धर्म से जुड़े महत्वपूर्ण स्थलों पर

सम्राट अशोक के द्वारा 84000 स्तूपों के निर्माण का उल्लेख मिलता है, जो संभवतः अतिशयोक्ति है. इस समय के स्तूपों में अब कुछ ही प्राप्य हैं. इनमें सांची, सारनाथ और कौशांबी के स्तूप महत्वपूर्ण हैं

साँची

साँची का पता सन् 1818 ई. में ‘जनरल टायलर’ ने लगाया था। यह विदिशा से 4 मील की दूरी पर 300 फीट ऊँची पहाड़ी पर है। प्रज्ञातिष्य महानायक थैर्यन के अनुसार-यहाँ के बड़े स्तूप में स्वयं भगवान बुद्ध के तथा छोटे स्तूपों में भगवान बुद्ध के प्रिय शिष्य ‘सारिपुत’ (सारिपुत्र) तथा ‘महामौद्गलायन’ समेत कई अन्य बौद्ध भिक्षुओं के अवशेष रखे हैं।

स्तूप के प्रमुख अंग

  • वेदिका- स्तूप की रक्षा के लिए
  • मेधि (कुर्सी)-जिस पर स्तूप का मुख्य भाग आधारित होता है
  • अण्ड-स्तूप का अर्द्ध-गोलाकार भाग
  • हर्मिका-शिखर के अस्थि पात्र की रक्षा हेतु
  • छत्र अथवा छत्रावली-धार्मिक चिह्न का प्रतीक

चैत्य

प्राकृतिक गुफाओं में निवास करने की परम्परा आदिम युग से ही शुरू हो गई थी. आगे जाकर पत्थरों को काटकर तराशा जाने लगा और अपने निवास के लिए मनुष्य ने उन्हें शिलागृह का रूप दे दिया. राजगृह में स्थित सोणभण्डार और सप्तपर्णि गुफाएँ भिक्षुओं के आवास के लिए ही बनाई गई थीं. बिहार में ही बराबर और नागार्जुन पहाड़ियों को काटकर अशोक और उसके पुत्र दशरथ ने आजीवक सम्प्रदाय के साधुओं हेतु निवास हेतु गुफाओं का निर्माण करवाया था. इसी परम्परा की अगली कड़ी बौद्ध चैत्यों के रूप में देखी जा सकती है. चैत्य, संस्कृत ‘चिता’ से व्युत्पन्न (पालि ‘चेतीय’)। इस शब्द का संबंध मूलत: चिता या चिता से संबंधित वस्तुओं से है (चितायांभव: चैत्य:)। चिता स्थल पर या मृत व्यक्ति की पावन राख के ऊपर स्मृति-भवननिर्माण अथवा वृक्षारोपण की प्राचीन परंपरा का उल्लेख ब्राह्मण, बौद्ध और जैन साहित्यों में हुआ हैं। रामायण, महाभारत और भगवद्गीता में इस शब्द का प्रयोग पावन वेदी, देवस्थान, प्रासाद, धार्मिक वृक्ष आदि के लिए हुआ है। चिता के जलाए जाने के बाद अवशिष्ट अंशों का चयन करके उन्हें जमीन के अन्दर गाड़ दिया जाता था और उसी स्थल पर स्मारक बनाये जाते थे जिन्हें चैत्य कहा गया. चैत्य वे स्मारक थे जहाँ महापुरुषों की अस्थियाँ, राख गाड़कर रखे जाते थे. आगे जाकर ये चैत्य पूजा के स्थल बन गये और इसी प्रकार मंदिर वास्तु का विकास हुआ. उदाहरणस्वरूप शोलापुर जिले का विष्णु मन्दिर, कृष्णा जिले कपोतेश्वर मंदिर और धारवाड़ जिले का ऐहोल दुर्ग मंदिर चैत्यगृहों के उदाहरण हैं. आज भारत में जो भी चैत्य भवन पाए जाते हैं उनमें से अधिकतर बौद्ध धर्म से ही सम्बंधित हैं. इसलिए चैत्य-वास्तु प्रायः बौद्ध धर्म का ही अंग बन कर रह गया है. बौद्ध धर्म के प्रचार और प्रसार के साथ चैत्यनिर्माण का प्रवेश अन्य देशों में हुआ। श्रीलंका में इसके लिए ‘दागबा’ (सं. धातुगर्भ) और तिब्बती में ‘दुंगतेन’ शब्द शब्द प्रचलित हुए। चैत्य शब्द का प्रयोग कालांतर में किसी पावन स्थान, मंदिर, अस्थिपात्र अथवा पवित्र वृक्ष के लिए भी होने लगा। आधुनिक पुराविद् इस शब्द का प्रयोग सामान्यतया बौद्ध या जैन मंदिर के लिये करते हैं, यद्यपि बौद्ध वास्तु में एक विशिष्ट शैली में निर्मित उस भवन को चैत्यप्रासाद कहा जाता है जिसमें उपासना के लिये स्तूप प्रतिष्ठापित किए जाते थे। इस तरह चैत्यप्रासादों के निर्माण के मूल में भी वही धार्मिक भावना थी। फर्गुसन का मत है कि भाजा, नासिक, एलोरा, कार्ले आदि स्थानों के बौद्ध चैत्यप्रासाद गिर्जाघरों के काफी निकट हैं।

चैत्य की संरचना

उनकी रचना शैली, वेदी या गर्भगृह, मंडप आदि में काफी समानता है, यद्यपि चैत्यों का निर्माण गिर्जाघरों के बहुत पहले से ही आरंभ हो गया था। गर्भगृह, मंडप और प्रदक्षिणपथ की रचनाशैली तथा चैत्यप्रासाद और हिंदू मंदिरों में भी विशेष समानता पाई जाती है। चैत्यप्रासाद के अर्धवृत्ताकार भाग में स्थापित स्तूप उपासना का केंद्र होता था। स्तूप के पार्श्व से प्रदक्षिणपथ जाता था जो उससे स्तंभों द्वारा पृथक कर दिया जाता था। प्रासाद का आधार वृत्ताकार होता था। अपने प्रारंभिक रूप में चैत्यप्रासाद काष्ठनिर्मित होते थे, जिनका उल्लेख रामायण तथा बौद्ध और जैन साहित्यों में सामान रूप से हुआ है। कालांतर में इन्हें स्थायी रूप देने की भावना से प्रेरित निर्माताओं ने समूचे चैत्यप्रासाद की सजीव कल्पना ठोस चट्टानों में आरंभ कर दी। खड़े पर्वत की चट्टानें तराशकर उनमें कला का एक नया संसार रचा जाने लगा। उनके भीतर बड़े बड़े मंडप, स्तंभ, स्तूप, बनाए जाने लगे। लेखों में इन्हें सेलघर (शैलगृह), चेतीयर (चैत्यगृह), सेलमंडप (शैलमंडप) आदि कहा गया है। यद्यपि प्रारंभ में इस दिशा में काष्ठनिर्मित चैत्यगृह का अंधानुकरण किया गया। लकड़ी के आधारों और जोड़ों को भी अनावश्यक ढंग से पत्थरों में भी उत्कीर्ण किया गया, जैसा कि भाजा, कोंदाने तथा कार्ले के भव्य चैत्यप्रासादों से स्पष्ट हैं। बाद में उस अनावश्यक रचनाविधान का परित्याग कर दिया गया। पश्चिमी भारत के बंबई के निकटवर्ती नासिक के दो सौ मील के क्षेत्र में इस तरह की लगभग ९०० चैत्य गुफाएँ हैं, जिनका निर्माणकाल ई. पू. दूसरी सदी से सातवीं सदी के बीच है। पहले चैत्य प्रायः खुले नभ में हुआ करते थे. बाद में वर्षा, आँधी और धूप से स्तूप और बौद्ध भक्तों की रक्षा करने तथा पूजा बिना रुकावट संपन्न हो सके, उसके लिए चैत्य को आच्छादित भवन का रूप दिया जाने लगा. पहाड़ों में चट्टानों को काटकर और तराशकर तथा मैदानों में ईंटो-पत्थरों से इन चैत्यगृहों को निर्मित करने की परम्परा आरम्भ हुई.

चैत्य के प्रकार

चैत्यगृह दो प्रकार के होते हैं –

गुहा चैत्य – Rock-cut Chaitya

चैत्यगृहों का आकार ईसाई गिरजाघरों के समान आयताकार होता था जो पीछे की ओर से अर्द्धवृत्त के समान गोलाकार रहती थी. स्तूप के समक्ष एक विशाल सभा-मंडप और चारो ओर बरामदा बनाकर परिक्रमा पथ बनाया जाता था. सभा-मंडप और बरामदों को अलग करने हेतु चैत्य में दोनों तरफ स्तम्भों की पंक्ति रहती थी और सामने प्रवेशद्वार होता था. प्रवेशद्वार के ऊपर घोड़े की नाल के आकार की मेहराब या चाप बनाई जाती थी. लोमश ऋषि की गुफा और भाज के गुफा चैत्य के मेहराब में सादृश्य स्पष्ट है.

         चैत्यगृहों के प्रवेशद्वार उत्कीर्णकला से अलंकृत होते थे. सभा-मंडप के स्तभ भी अनेक प्रकार के शीर्षों से सजाये जाते थे.

संरचनात्मक चैत्य – Structural Chaitya

मैदानों में ईंटों-पत्थरों से बनाए गये चैत्यगृहों की छतें गजपृष्ठाकृति या ढोलक के आकार की होती थीं.  विद्वान् मानते हैं कि पहले चैत्यों की छतों में लकड़ी की शहतीरें लगाईं जाती थीं और कालांतर में जब पर्वतों को तराशकर चैत्य बनाए जाने लगे तो उनकी निर्माण-पद्धति लकड़ी जैसी ही रखी गई

गुहाचैत्य और संरचनात्मक चैत्य में अंतर

गुहाचैत्यों में सूर्य का प्रकाश केवल प्रवेशद्वार से ही संभव था जबकि मैदानों में निर्मित संरचनात्मक चैत्यों के बाह्य दीवारों में गवाक्ष होने से प्रकाश अन्य दिशाओं में फ़ैल सकता था. संरचनात्मक चैत्यों का बाहरी आकार गुहाचैत्यों के बाहरी आकारों से अधिक दर्शनीय था.

दक्षिण भारत के गुहाचैत्य और विहार

पश्चिम घाट के ही समान दक्षिण भारत के आंध्रप्रदेश में कृष्णा और गोदावरी नदियों के मध्य मौर्यकाल से ही बौद्धधर्म की गतिविधियाँ आरम्भ हो गई थीं. उड़ीसा में धौली तथा जौगढ़ में अशोक द्वारा अभिलेख अंकित कराने के बाद ही बौद्ध धर्म की यह परम्परा आगे बढ़ गयी थी। पीठापुरम, संकाराम, घंटशाल, भट्टीप्रोलु, अमरावती, नागार्जुनकोंड, जगय्यपेट तथा गुण्टपल्ली आदि स्थानों पर गुहाचैत्यों, संरचनात्मक चैत्यों, विहारों तथा स्तूपों का निर्माण तृतीय शती ई. तक होता रहा. गुहाचैत्य सबसे पूर्व गुण्टपल्ली में बना था जो बराबर की पहाड़ी में बना लोमश ऋषि गुफा की शैली का है. गोलाई से निर्मित इस चैत्य के बीच में एक ही चट्टान से तराशा गया स्तूप है जिसके चारों तरफ संकरा प्रदक्षिणापथ है. इस चैत्य की छत गोल है और उसमें लकड़ी की शहतीरों जैसे अंकन उसे काष्ठ-वास्तु की प्रतिकृति सिद्ध करते हैं. गुण्टपल्ली में द्वित्तीय शताब्दी में बनाए गये एक संरचनात्मक चैत्य के अवशेष भी मिले हैं. संकाराम (विशाखापत्तनम) में भी द्वितीय शती ई.पू. के तीन गुहाचैत्य बनाए गये थे. इनके भीतर के स्तूप एक ही चट्टान से तराशकर निर्मित किये गये थे जिन्हें अंग्रेजो में “मोनोलिथिक” (monolithic) कहते हैं. सबसे बड़े गुहाचैत्य के स्तूप के आधार का व्यास 65 फीट था.

विहार

पिटकों में भिक्षुओं के निवास स्थान के बारे में अनेक संदर्भ उपलब्ध हैं। आरंभिक दौर में भिक्षु अपने निवास के लिए झोपड़ियाँ बनाते थे। जमीन को समतल कर उस पर बाँस अथवा काष्ठ के स्तम्भ लगाए जाते थे। फिर उन्हे कुश, नरकुल तथा वृक्ष की टहनियों से छाया जाता था। पिटक के अनुसार, यह झोपड़ी बुद्ध के बित्ते से 12 बित्ता लंबी और 7 बित्ता चौड़ी (10.5X6 फीट) बनाई जाती थी। दो मंजिली कुटियों के संदर्भ भी प्राप्त होते हैं। दीवारों को समतल बनाने के लिए मिट्टी अथवा गोबर का लेप किया जाता था।  भिक्षुओं को अपनी कुटिया को सफ़ेद, काला तथा गेरू से रंगने की अनुमति थी। पुराने कपड़ों को कूटकर, उन्हें मिट्टी में मिलाकर उनका लेप करने का भी उल्लेख है। सांची से प्राप्त चित्रों में त्रिकोणाकार छत वाली खपरैल लगी झोपड़ियाँ भी दिखाई गयी हैं। बुद्ध ने भिक्षुओं के लिए वृक्ष-मूल पर आवास का आदर्श प्रतिपादित किया था, पर इस आदर्श की व्यावहारिक परिणति नहीं हो सकी। इसके लिए तत्कालीन परिस्थितियां भी उत्तरदायी थी। बौद्ध संघ में वर्षावास की परम्परा प्रचलित थी। इसके लिए किसी पूर्व निर्धारित स्थल पर सामूहिक रूप से वर्षावास व्यतीत करना था। वर्षाकाल में भिक्षुओं के लिए तीन मास तक चारिका निषिद्ध थी। स्पष्टतः वर्षा की विभीषिका को देखते हुए खुले आकाश के नीचे तीन मास तक रहना असंभव था। अतः इसके लिए ऐसे आवासों की आवश्यकता पड़ी, जिनकें भिक्षु शरण ले सके, साथ ही उनके लिए कम से कम तीन मास तक चलने वाली जीवनोपयोगी सामग्रियां संग्रहित की जा सकें। तब बुद्ध ने पाँच प्रकार के आवासों की अनुमति दी- विहार, अट्ठयोग, प्रासाद, हर्म्य तथा गुहा । इस प्रकार बनाए गए भिक्षु आवास ही विहार के नाम से विदित हुए।

विहारों की संरचना

राहुल सांकृत्यायन के अनुसार, यह उत्तर भारत के सामान्य गृहों की तरह बीच में प्रांगण और उसके चारों ओर कोठरियों वाली संरचना होती थी। स्नान के लिए जन्ताघर के नाम से अलग कमरे की व्यवस्था होती थी। पानी रखने के लिए बड़े-बड़े मटकों की और पानी गरम करने के लिए चूल्हों की सुविधा होती थी। विहारों के साथ कूप निर्माण भी किए जाते थे।

महत्वपूर्ण विहार

  • राजगृह में वेणुवन,
  • कौशाम्बी में घोषिताराम,
  • श्रावस्ती में जेतवन,
  • पाटलिपुत्र में अशोकाराम,
  • नालंदा का महाविहार,
  • साँची का श्रीमहाविहार

चैत्य और विहार में अंतर

  • चैत्य धार्मिक चर्चा और उपासना स्थल थे, विहार बौद्ध भिक्षुओं के आवास के लिए बनाए जाते थे।
  • चैत्य में स्तूप का होना आवश्यक था, विहार में स्तूप का होना आवश्यक नहीं था.
  • निर्माण शैली की दृष्टि से विहार चैत्यगृह से भिन्न होते थे.
  • विहार चौकोर होती थी. गुहा-विहारों के बीच एक बड़ा-सा मंडप स्थापित किया जाता था और उसके तीनों ओर भिक्षुओं के रहने के लिए छोटे-छोटे कमरे बनाए जाते थे.
  • दूसरी ओर चैत्य ईसाई गिरजाघरों के समान आयताकार होती थी जो पीछे की ओर अर्द्धवृत्त के समान गोलाकार रहती थी.

जैन स्थापत्य

प्रारंभिक वर्षों में कई जैन मंदिरों का निर्माण बौद्ध शैलकृत शैली के आधार पर बौद्ध मंदिरों के आसपास किया गया। प्रारंभ में जैन मंदिरों को पूरी तरह से पहाड़ों से काट कर ही बनाया जाता था और ईंट का प्रयोग लगभग न के बराबर होता था। लेकिन बाद के काल में जैन शैली में परिवर्तन आया और पत्थर और ईंटों से मंदिरों का निर्माण शुरु हो गया। कर्नाटक, महाराष्ट्र और राजस्थान के जैन मंदिर विश्व विख्यात हैं। राजस्थान में माउंट आबू और रानकपुर के मंदिर विशेष रूप से अपनी स्थापत्य कला के लिए मशहूर हैं। देवगढ़ (ललितपुर, उत्तर प्रदेश), एलोरा, बादामी और आईहोल में भी जैन स्थापत्य और वास्तुकला के कई बेहतरीन उदाहरण पाये जाते हैं।

जैन मंदिर की संरचना

जैन मंदिर की संरचना दो प्रकार की मिलती है-

  • शिखर बंद
  • शिखर विहीन

गुजरात के चालुक्य राजाओं ने जैन धर्म को संरक्षण प्रदान किया। यह वही समय था जबकि दिलवाड़ा और आबू पर्वत जैसे अत्यंत भव्य मंदिरों का निर्माण किया गया था। दक्षिण भारत में नवीं एवं दसवीं शताब्दियों में जैन धर्म अपने विकास की चरम सीमा पर पहुँचा। कर्नाटक के गंग शासक जैन धर्म के प्रमुख संरक्षक थे। इस काल में वसाढ़ी (जैन मंदिर) और महास्तम्भ कई भागों में स्थापित किए गए।

मंदिर स्थापत्य

मन्दिर शब्द संस्कृत वाङ्मय में अधिक प्राचीन नहीं है। महाकाव्य और सूत्रग्रन्थों में मंदिर की अपेक्षा देवालय, देवायतन, देवकुल, देवगृह आदि शब्दों का प्रयोग हुआ है। मंदिर का सर्वप्रथम उल्लेख शतपथ ब्राह्मण में मिलता है। शाखायन स्त्रोत सूत्र में प्रासाद को दीवारों, छत, तथा खिड़कियों से युक्त कहा गया है। ई पू के कुछ मंदिर उत्खनित हुए हैं, जिनकी अवस्था जर्जर है।

मंदिर की संरचना

आरंभिक मंदिरों में काष्ठ का अत्यधिक उपयोग हुआ. प्रारंभिक मंदिरों का वास्तु विन्यास बौद्ध विहारों से प्रभावित था। इनकी छत चपटी तथा इनमें गर्भगृह होता था। मंदिरों में रूप विधान की कल्पना की गई और कलाकारों ने मंदिरों को साकार रूप प्रदान करने के साथ ही देहरूप में स्थापित किया। चौथी सदी में भागवत धर्म के अभ्युदय के पश्चात (इष्टदेव) भगवान की प्रतिमा स्थापित करने की आवश्यकता प्रतीत हुई। अतएव वैष्णव मतानुयायी मंदिर निर्माण की योजना करने लगे। साँची का दो स्तम्भयुक्त कमरे वाला मंदिर गुप्तमंदिर के प्रथम चरण का माना जाता है। बाद में गुप्त काल में वृहदस्तर पर मंदिरों का निर्माण किया गया जिनमें वैष्णव तथा शैव दोनों धर्मो के मंदिर हैं। प्रारम्भ में ये मंदिर सादा थे और इनमें स्तंभ अलंकृत नही थे। शिखरों के स्थान पर छत सपाट होती थी तथा गर्भगृह में भगवान की प्रतिमा, ऊँची जगती आदि होते थे। गर्भगृह के समक्ष स्तंभों पर आश्रित एक छोटा अथवा बड़ा बरामदा भी मिलने लगा।

गुप्त कालीन मंदिर

यह एकल चौकोर संरचना के मंदिर थे. इसके केंद्र में गर्भगृह होता था. स्तंभयुक्त गलियारे के साथ एक प्रवेश द्वार होता था. स्तंभों के ऊपर सिंह शीर्ष भी मिले हैं. तिगवा और सांची के मंदिर इस दृष्टि से उल्लेखनीय हैं. दशावतार मंदिर, देवगढ़ (5वीं -6ठी शताब्दी) को गुप्तकालीन वास्तु का श्रेष्ठ उदाहरण माना जा सकता है. इस मंदिर की दक्षिणी दीवार पर विष्णु की अनंतशयनम मुद्रा उकेरी गयी है, जिसमें विष्णु शेषनाग के ऊपर विश्राम की मुद्रा में लेटे हुए हैं. उनके चरणों में लक्ष्मी विराजमान हैं. ऊपर कमल के ऊपर ब्रह्मा की छवि है.

         कुछ गुप्तकालीन मंदिरों में द्वितीय तल की उपस्थिति के प्रमाण भी मिले हैं. उदाहरण के तौर पर 5वीं सदी ईस्वी के नचना कुठार के पार्वती मंदिर को देखा जा सकता है.

         6ठी सदी ईस्वी से मंदिर का निर्माण जगती(प्लैटफ़ार्म) के ऊपरकिया जाने लगा. देवगढ़ के मंदिर में इस जगती को देखा जा सकता है. देवगढ़ में जगती की ढलानों पर हिन्दू मिथकीय प्रसंग चित्रित हैं. जगती के केंद्र में मुख्य मंदिर है,  जहां पहुँचने के लिए चारों तरफ से सीढ़ियाँ बनी हैं. मुख्य मंदिर गवाक्ष विहीन है.

        उत्तर प्रदेश के भीतरगांव का गुप्तकालीन मंदिर प्राप्त अवशेषों में सर्वाधिक पूर्ण संरचना वाला मंदिर है. यह 5वीं सदी की पूर्णतया ईंटों से निर्मित संरचना है. इसमें शिखर और गवाक्ष की स्पष्ट उपस्थिति है. इसका ऊपरी हिस्सा नष्टप्राय है.

शैलियों का विकास

6ठी शताब्दी के आखिरी दौर से उत्तर और दक्षिण भारत के मंदिर निर्माण शैलियों में अंतर स्पष्ट होने लगते हैं। भौगोलिक ,सांस्कृतिक और  भाषायी भिन्नता के कारण भारत के उत्तरी, दक्षिणी और मध्य भागों में क्रमशः मंदिर निर्माण की नागर, द्रविड़ और बेसर शैलियाँ विकसित होती हैं. इसके अतिरिक्त विभिन्न क्षेत्रों में कुछ क्षेत्रीय शैलियाँ भी दिखाई देती हैं.

नागर

इसे इंडो आर्यन शैली या उत्तर भारतीय शैली भी कहते हैं. नागर शैली में मंदिरों का निर्माण चौकोर या वर्गाकार रूप में किया जाता था। प्रमुख रूप से उत्तर भारत में इस शैली के मंदिर पाये जाते हैं। सामान्य रूप से हिमालय से विंध्य पर्वत के बीच यह शैली पाई जाती है. यह शैली गुप्तकालीन मंदिर स्थापत्य का स्वाभाविक विकास है. इनमें मुख्य द्वार को छोड़ कर शेष तीन दिशाओं की दीवारों के साथ रथों का निर्माण (त्रिरथ) किया गया है. कालांतर में विशाल मंदिरों में रथों की संख्या में वृद्धि हुई और पंचरथ, सप्तरथ और नौरथ वाले मंदिर भी बनने लगे. इन मंदिरों के शिखर गुप्तकाल की अपेक्षा अधिक प्रत्यक्ष हैं.

द्रविड़ मंदिर शैली

इसका शैली का प्रसार कृष्णा नदी के दक्षिण में अर्थात सुदूर दक्षिण भारत में हुआ. यहाँ गुप्तकालीन मंदिरों के आधार को बहुमंजिला बनाया गया. चट्टानों को काट कर रथों का निर्माण किया गया. महाबलीपुरम (7वीं सदी) के मंदिर में द्रौपदी के अतिरिक्त सभी रथों को बहुमंज़िली शक्ल दी गयी है। इस शैली में चैत्यों के जैसे वक्राकार गवाक्ष मिलते हैं. यहाँ रथों का निर्माण मुख्य मंदिर से स्वतंत्र रूप से किया गया है. इस शैली में आरंभिक शैलकृत संरचना में नरसिंहवर्मन द्वितीय(700-728) के समय परिवर्तन दिखाई देता है. महाबली पुरम के तट मंदिर में दो गर्भगृह एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, जिनके पिरामिड एक दूसरे से स्वतन्त्र हैं. कलश और स्तूपिका भी निर्मित किये गए हैं.

  • कांचीपुरम का मंदिर -यह नरसिंहवर्मन द्वितीय (राजसिंह) द्वारा निर्मित है. इसमें गर्भगृह के साथ पिरामिडनुमा दीवार बनाई गई है. स्तम्भयुक्त मंडप है, जिसकी छत सपाट है. मंडप और गर्भगृह- दोनों संरचनाएं एक चौकोर प्रांगण में हैं. गोपुरम की उपस्थिति है. विमान

वैकुंठ पेरुमल मंदिर कांचीपुरम

  • वृहदेश्वर मंदिर, तंजौर- राजराज प्रथम निर्मित
  • वृहदेश्वर मंदिर , गंगईकोंड चोलपुरम -राजेन्द्र निर्मित

बेसर शैली

इसे चालुक्य शैली या कर्नाटक शैली भी कहते हैं. यह शैली विंध्य पर्वत से कृष्णा नदी के बीच विकसित हुई. चालुक्य शासकों द्वारा प्रारम्भ इस शैली को होयसल शासकों ने विकसित किया. यह नागर और द्रविड़ शैलियों का मिला जुला रूप है. इसमें स्तंभों और दीवारों का भी अलंकरण किया गया. 680 ई. का पटदक्कल-कर्नाटक का पापनाथ मंदिर बेसर शैली का आरंभिक उदाहरण है. इसमें विमान और मंडप अंतराल के द्वारा जोड़े गए हैं. बसर शैली में कई जगह एक अतिरिक्त खुला मंडप भी मिलता है. विमान बहुमंज़िली पिरामिडनुमा आकार में बनाए गए हैं. मंडप सपाट छत और स्तम्भयुक्त हैं.

मौर्यकालीन स्थापत्य

मौर्यकाल के दौरान देश में कई शहरों का विकास हुआ। मौर्यकाल भारतीय कलाओं के विकास के दृष्टिकोण से एक युगांतकारी युग था। इस काल के स्मारकों व स्तंभों को भारतीय कला के क्षेत्र में मील का पत्थर माना जाता है। इस काल के स्थापत्य में लकड़ी का काफी प्रयोग किया जाता था। अशोक के समय से भवन निर्माण में पत्थरों का प्रयोग प्रारंभ हो गया था। ऐसा माना जाता है कि अशोक ने ही श्रीनगर (कश्मीर) व ललितपाटन(नेपाल) नामक नगरों की स्थापना की थी। स्थापत्य के दृष्टिकोण से सांची, भारहुत, बोधगया, अमरावती और नागार्जुनकोंडा के स्तूप प्रसिद्ध हैं। अशोक ने 30 से 40 स्तम्भों का निर्माण कराया था।

          पत्थरों पर पॉलिश करने की कला इस काल में इस स्तर पर पहुँच गई थी कि आज भी अशोक की लाट की पॉलिश शीशे की भांति चमकती है। मौर्यकालीन स्थापत्य व वास्तुकला पर ग्रीक, फारसी और मिस्र संस्कृतियों का पूरी तरह से प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। कुम्हरार से प्राप्त मौर्यकालीन अवशेष और मेगास्थनीज़ के वर्णन से भी मौर्य स्थापत्य की श्रेष्ठता का पता चलता है. इस काल में काष्ठ प्रयोग अधिक होने के कारण ज़्यादातर संरचनाएँ नष्ट हो गयी हैं.

मौर्योत्तर स्थापत्य

इस समय के कला स्मारक स्तूप, गुफा मंदिर (चैत्य), विहार, शैलकृत गुफाएं आदि हैं। भरहुत का प्रसिद्ध स्तूप का निर्माण शुंग काल के दौरान ही पूरा हुआ। इस काल में उड़ीसा में जैनियों ने हाथी गुम्फा, रानी गुम्फा, मंचापुरी गुम्फा, गणेश गुम्फा, जय विजय गुम्फा, अल्कापुरी गुम्फा इत्यादि गुफा मंदिरों का निर्माण कराया। अजंता की कुछ गुफाओं का निर्माण भी इसी काल के दौरान हुआ। इस काल के गुफा मंदिर काफी विशाल हैं। सातवाहन वंश ने गोली, जग्गिहपेटा, भट्टीप्रोलू, गंटासाला, नागार्जुनकोंडा और अमरावती में कई विशाल स्तूपों का निर्माण कराया।

गुप्तकालीन स्थापत्य

गुप्तकाल के दौरान स्थापत्य व वास्तु अपने चरमोत्कर्ष पर था। इस काल के मंदिरों का निर्माण ऊँचे चबूतरों पर पत्थर एवं ईंटों से किया जाता था। गुप्तकालीन मंदिरों के सबसे भव्य और महत्वपूर्ण मंदिर देवगढ़ (झाँसी के पास) और भीतरगांव (कानपुर) हैं। इन मंदिरों में रामायण, महाभारत और पुराणों से विषय-वस्तु ली गई है। भीतरगांव (कानपुर) का विष्णु मंदिर ईंटों का बना है और नक्काशीदार है।